धर्मों में नारी की स्थिति-एक दार्शनिक एवं मानवशास्त्रीय विमर्श
महेन्द्र कुमार प्रेमी1 एवं जितेन्द्र कुमार प्रेमी2
1शोध छात्र (पी-एच.डी.), स्वामी विवेकानन्द स्मृति तुलनात्मक धर्म, दर्शन एवं योग अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़
2सहा. प्रा. मानवविज्ञान अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़
संक्षेपिका
सर्वाधिक रहस्यवान् होने के उपरांत भी मानव जिसके प्रति सर्वाधिक श्रद्धावनत और समर्पित है उसे धर्म से संबोधित किया जाता है। इस शब्द का आश्रय लेकर मानव ने एक ओर जहाँ सर्वाधिक सृजनात्मक कार्य किए है तथा मानवता के श्रेष्ठतम् मूल्यों को उद्घाटित किया है वहीं दूसरी ओर इस शब्द का आड़ लेकर उसने सर्वाधिक रक्त भी बहाया है। मानव का समस्त पाखण्ड, समस्त अंधविश्वास धर्म से ही जुड़ा हुआ है। कहने को तो सभी धर्माें मे समानता का उपदेश निहित होते हैं लेकिन जहाँ स्त्रियों के प्रति रूख अपनाने का सवाल आता है वहाँ समानता की अवधारणा उपेक्षित, गौण या फिर भ्रष्ट हो जाती है। धर्म के नाम पर स्त्रियों को पद्दलित कर इन्हें उपभोग्या बनाकर विकास की पिछली कतार में धकेल दिया गया है । विकास में स्त्री सदा हासिये पर ही रही, बाद में आए विचार की तरह।
वैदिक युग के बाद से नारी के स्वतंत्र अस्तित्व को कभी स्वीकार नहीं किया गया। ऐसी परिस्थितियाँ और विधान बनते चले गए कि वह पिता, पति और पुत्र के अधीन रहने को बाध्य रही। स्त्री के लिए पति का स्थान ईश्वर से ऊँचा माना गया, पति को परमेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित किया गया जिसकी चरणदासी बन आजीवन सेवा करना ही स्त्री का परम धर्म माना गया। शतपथ बा्रम्हाण ( 3/2/4/6) में कहा गया है कि यज्ञ के समय कुत्ता, शुद्र और नारी की ओर नहीं देखना चाहिए। मैंत्रयणी संहिता ( 3/8/3) और तैत्तरीय संहिता ( 6/5/8/2) में स्पष्ट लिखा है कि नारी अशुभ है।
अन्य धर्माें की तरह ईस्लाम ने भी स्त्री को पुरूष के आधीन माना है। सुर निसा 4 की आयत 34 में कहा गया है कि - मर्द औरतों पर हाकिम और मुसल्लत ( आच्छादित ) है इसलिए खुदा ने कुछ को कुछ से अपबल ( उत्तम ) बनाया है मर्द अपना माल खर्च करते हैं तो जो नेक बीवियाँ हंै, वे मर्दों के हुक्म पर चलती हैं और उनके पीठ पीछे खुदा की हिफाजत में माल व आवक की खबरदारी करती हैं। और जिन औरतों के बारे में तुम्हें मालूम हो कि वह अवज्ञा करने लगी है तो पहले उनकों जुबानी समझाओं अगर न समझे तो फिर उनके साथ सोना छोड़ दो, अगर इस पर भी न माने तो मारों-पीटो और फरमावरदार ( आज्ञाकारिणी ) हो जाए तो उन्हंे तकलीफ देने का बहाना मत ढूंढों।
औरतों के त्याग, बलिदान से सीचें ईसाई धर्म में औरत को समाज अधिकार तो दूर उसे पुरूषों की तुलना में हीन बताया गया है।यहाँ पर विश¢ष ध्यान देने वाली मुख्य बात है जो बाईबिल से नारी के अस्तित्व को दर्शाया है कि “और परमपिता परमेंश्वर ने आदम को गहरी नींद में सुलाया और इसकी पसलियों में से एक पसली निकालकर उससे उसने नारी को बनाया और आदम के पास लाए”।
सिक्ख धर्म में नारियों को पुरूषों के बराबर सम्मान तथा स्थान हासिल है। गुरू नानक जी क¢ यह फरमान कि सुन मण्डल इक जोगी बैसे, नारी न पुरखु कहहू कोई जैसे, यह अमर संदेश दिया कि ईश्वर की ज्योति, जो प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है उसे नारी कहा जा सकता है न पुरूष, वह परमात्मा का ही अंश है।साथ ही साथ विडम्बना यहा भी है कि आज सिक्खों की धरती में भ्रुण हत्या जैसे जघन्य अपराध लगातार बढ़ते ही जा रहे है। परिणाम स्वरूप चण्ड़ीगढ़, पंजाब, हरियाणा व दिल्ली जैसे स्थानों में लिंगानुपात क्रमशः 773/1000, 874/1000, 861/1000 तथा 821/1000 हो गयी है जो कि भारत के अन्य राज्यों की तुलना में निम्नतम लिंगानुपात हैं।
धर्मों में चाहे कितनी भी नारियों की उपेक्षित स्थिति बताई गई हो परन्तु सच्चाई तो यही है कि मानव जीवन क¢ विकास के लिए नारी ही उत्तरदायी है अर्थात मानव जीवन की संपूर्णता एवं अस्तित्व को बनाए रखने हेतु नारी का सर्वोच्च स्थान है। नारी चाहे स्वतंत्र हो या पराधीन परन्तु मानव के अस्तित्व को बनाए रखने हेतु जितना पुरूष का उत्तरदायित्व है उससे बढ़कर नारी का उच्च और सराहनीय योगदान है। अतः पुरूष और नारी एक-दूसरे के पूरक हंै एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती ,यही एक मात्र सच्चाई है जो मानव जीवन के अस्तित्व को बनाये रखने हेतु महत्वपूर्ण और अटूट कड़ी है।
भूमिका:- धर्म मानव को अपने प्रत्येक रूप में समेट लेता है धर्म एक ऐसा शब्द है, जिसके समस्त रहस्यों का उद्घाटन करने की क्षमता मानव के पास है भी या नहीं यह भी विवाद का विषय हो सकता है। सर्वाधिक रहस्यवान् होने के उपरांत भी मानव जिसके प्रति सर्वाधिक श्रद्धावनत और समर्पित है उसे धर्म मानकर ही संबोधित करता है। धर्म के प्रति यह समर्पण अनेक बार अंधविश्वास और अंधश्रद्धा तक पहुँच जाता है और जिसे वह धर्म मानता है उसकी रक्षा के लिए वह अपने प्राणों का ही नहीं बल्कि अपना अस्तित्व तक का बलिदान करने के लिए तैयार हो जाता है। इस शब्द का आश्रय लेकर मानव ने एक ओर जहाँ सर्वाधिक सृजनात्मक कार्य किए है, अपना उत्कर्ष किया ह,ै मानवता के श्रेष्ठम् मूल्यों को उद्घाटित किया है, वह दूसरी ओर इस शब्द की आड़ लेकर उसने सर्वाधिक रक्त भी बहाया है। धर्म के नाम पर सर्वाधिक युद्ध हुए, सर्वाधिक हत्याएँ हुई, सर्वाधिक शोषण हुआ और सर्वाधिक उत्पीड़न भी। धर्म की आड़ लेकर जैसी निरंकुशता और बर्बरता के क्षेत्र में मानव उतरा है, वैसी निरंकुशता और बर्बरता मानव ने अपने स्वयं के प्राणों की रक्षा के लिए भी नहीं की। मानव का समस्त पाखण्ड, समस्त अंधविश्वास धर्म से ही जुड़ा हुआ है तथा मानव का अपनी श्रेष्ठतम् उपलब्धियाँ भी अंततः धर्म से ही प्राप्त हुई हैं। यही कारण है कि अभी तक धर्म को लेकर जो विरोधाभास हैै उसे जानने और समझने की आवश्यकता है।
धर्म एक एसी अनुभूति है जिसे स्वयं प्राप्त करना होता है। धर्म एक ऐसी क्रांति है जो किसी भी व्यक्ति में तभी घटित होती है जब वह जिज्ञासारत होकर अपनी समस्त प्राणिल बौद्धिक ऊर्जा धर्म के अन्वेषण व अनुसंधान में झोंक देता है। जगत का कण-कण धर्म से केवल अभिभूत ही नहीं है बल्कि वह अनुभूति का ऐसा स्वरूप भी है जो चिरंतन व सतत, सनातन हैं। अर्थात् जो कर्म के माध्यम से सतत् प्रवाहित होता है, धर्म का संबंध कर्म से है। धर्म केवल दार्शनिक परिकल्पना नहीं है वह एक ऋतु सत्य है। धर्म को परिभाषाओं से नहीं बांधा जा सकता। इसे वाद-विवाद का विषय बना लेने से उसके वास्ताविक रूप को जाना और समझा नहीं जा सकता। यदि इस शब्द को जानना और समझना है इसकी अनुभूति प्राप्त करनी है इसके रहस्यों की पर्ताें को उघाड़ना है, तो धर्म के भाव को कर्म के क्षेत्र उतारना होगा तथा उसे अनुभव के क्षेत्र में भी लाना होगा।
कहने को तो मूलतः महान धर्माें मे समानता अथवा अपेक्षाकृत समानता का उपदेश निहित होता है। लेकिन जहाँ स्त्रियों के प्रति रूख अपनाने का सवाल आता है, वहाँ समानता की अवधारणा उपेक्षित, गौण या फिर भ्रष्ट हो जाती है। धर्म के नाम पर स्त्रियों को पददलित कर इन्हें आज उपभोग्या बनाकर विकास की पिछली कतार में धकेल दिया गया है । विकास में स्त्री सदा हासिये पर ही रही, बाद में आए विचार की तरह। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी को समकक्ष समान आधार देने से आम मानसिक शक्ति एवं संकाय दुगुनी होगी मानवता की उज्जवल सेवाओं के लिए उन्हें उपलब्ध किया जा सकेगा। दूसरे स्त्री और पुरूष के बीच असमानता जो वैवाहिक जीवन के लए हानिप्रद है को दूर करके विवाह को अधिक सार्थक बनाया जा सकेगा। मनुष्य जाति की नैतिक पुर्नस्थापना तभी आरंभ होगी जब सामाजिक संबंधों की बुनियाद समान न्याय के नियम पर रखी जाएगी और जब अधिकारों एवं उनके रोपण में मनुष्य अपने समान साथी के लिए गहरी सहानुभूति अनुभव करना सीख जाएगा।
शास्त्र और समाज राष्ट्र और धर्म अगर हमें यह सिखाते है कि औरत को कोई आजादी नहीं मिलनी चाहिए, तो वैसी औरत निश्चय ही अधूरी है। उसे पूर्णता के लिए अपने तन-मन घर आजाद रखने होंगे। औरत की किसी दूसरे जानवर या पालतू पशु की खोल ओढ़कर नहीं जीना है। इसे महज एक शरीर या वस्तु के रूप में नहीं देषा जाना चाहिए।
हिन्दू धर्म में नारी की स्थिति
हमारेे देश में जिस शब्द का अर्थ सतीत्व होता है, वह केवल नारियों के लिए ही है। हमारे शास्त्रकार वनों व जंगलों में निवास करते थे लेकिन फिर भी वे समाज को पहचानते थे इसलिए वे लोग यह शब्द बनाकर अपने जाति -भाईयों अर्थात पुरूषों को असुविधा में नहीं डाले। जो हो निश्चित यह हुआ था कि नारी के लिए तो सतीत्व है परन्तु पुरूष के लिए नहीं। और सतीत्व का चरम रूप हो गया सहमरण। हिन्दू समाज की गौरवशाली महान संस्कृति का यदि ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो उजागर होगा कि जहाँ तक शूद्रों, दासों और स्त्री जाति के प्रति आचार-व्यवहार का संबंध है उनके लिए हिन्दू संस्कृति में गौरव करने लायक कोई बात नहीं है। जिस युग को हिन्दू जाति का स्वर्णिम युग बताया जाता है हम पाते है कि स्वर्णिम कहे जाने वाले इस काल में शूद्र दास और नारी अधम एवं हीन स्थिति में रहने को बाध्य थे।
वैदिक युग के बाद से नारी एक वस्तु में बदल दी जाती थी। वह पुरूष की भोग्या एवं वंश बढ़ाने का साधन मात्र रह जाती थी। वैदिक युग के बाद से नारी के स्वतंत्र अस्तित्व को कभी स्वीकार नहीं किया गया। ऐसी परिस्थितियों और विधान बनते चले गए कि वह पिता पति और पुत्र के अधीन रहने को बाध्य रहे। स्त्री के लिए पति का स्थान ईश्वर से ऊँचा है पति को परमेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित किया गया जिसकी चरणदासी बन आजीवन सेवा करना ही स्त्री का परम धर्म माना गया। नारी की तुलना कुत्तेे, शुद्र और चांडाल से की गई। शतपथ ब्रम्हाण ( 3/2/4/6) में कहा गया है कि यज्ञ के समय कुत्ता, शुद्र और नारी की ओर नहीं देखना चाहिए। मैंत्रयणी संहिता ( 3/8/3) और तैत्तरीय संहिता ( 6/5/8/2) में स्पष्ट कहा लिखा है कि नारी अशुभ है।
हिन्दु समाज में नारी की इस अधिकार शून्य दयनीय अवस्था के लिए मुख्यतः धर्म उत्तरदायी है। वैदिक युग के बाद रचे गये धार्मिक ग्रंथों, संहिताओं स्मृतियों, ब्राम्हणों, पुराणों एवं सूत्रों से स्त्री जाति के कर्तव्यों और धर्म पर विशद रूप से से प्रकाश डालते हुए उपर्युक्त बातों को धर्माेचित एवं न्यायोचित बताया गया है तथा उनके उल्लंघन को अक्षम्य महापाप बताया गया है। सती प्रथा जैसी जघन्य अमानुषिक प्रथा दुनियां के किसी भी धर्म में नहीं है केवल हिन्दु धर्म में है। यहाँ एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि पुत्र के जन्म को मोक्ष और स्वर्ग प्राप्ति से जोड़ प्राचीन समाज में पुत्री की अपेक्षा पुत्र के महत्व को स्थापित किया जा चुका था। इस प्रभाव से उत्पन्न संस्कारों के कारण समाज में स्त्री उपेक्षित दयनीय और प्रताड़ित हो दोयम दर्जे की होती चली गई। सम्भवतः इसलिए भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ आज भी प्राचीन रूढ़ियों और संस्कारों के वशीभूत हो आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकि का लाभ उठाते हुए बालिका भ्रूण की हत्या सबसे ज्यादा हो रही है। जो भारतीय समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता के घिनौने चेहरे से पर्दा उठाने के लिए पर्याप्त है। 19वीं शताब्दी से लेकर आज वर्तमान में हिन्दू धर्मं में अनेक परिवर्तन हुए है जिसके फलस्वरूप धार्मिक, समाजिक सुधार एवं नारियों की स्थिति में पर्याप्त सुधार हुई है जो एक सम्मानजनक बात है। भारतीय हिन्दू समाज में समय के साथ-साथ व्यापक सकारात्मक परिवर्तन परिलक्षित हो रहे है और महिला अधिकारों में सतत् वृध्दि हो रही है। आज भारत में जहाॅ सुषमा स्वराज, सोनिया गांधी, मायावती, ममता बनर्जी जैसी ओजस्वी महिलाएं संपूर्ण भारतीय समाज को दिशा देने में अपना संपूर्ण योगदान कर रही है।
ईसाई धर्म में नारी की स्थिति
अक्सर कहा जाता है कि ईसाई धर्म ने स्त्रियों की दशा को सुधारा है। जिस समाज से इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाता है कि कठोर नैतिक संहिताओं का उल्लंघन न किया जाए और इनका सख्ती से पालन किया जाए इस समाज में स्त्री कभी भी उदार एवं स्वतंत्र स्थिति का उपभोग कभी नहीं कर सकती। महाधीशों ने सदैव स्त्री को मुख्यतः बहकाने वाली मोहिनी के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने हमेशा यह सोचा है कि वह अपवित्र कामुकता को उत्तेजित कर पाप के रास्ते की ओर ले जाने वाली है। आरंभ से चर्च की यह शिक्षा रही है और आज भी है कि स्त्री का कौमार्यावस्था सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन जिनके लिए कौमार्य (ब्रहा्रचर्य) को पालना असंभव है उन्हें चर्च से विवाह की इजाजत दी है। अर्थात् कामाग्नि में जलते रहने की अपेक्षा विवाह कर लेना बेहतर है। औरतों के त्याग, बलिदान से सीचें ईसाई धर्म में औरत को समाज अधिकार तो दूर उसे पुरूषों की तुलना में हीन बताया गया है। यहाँ पर विशेष ध्यान देने वाली मुख्य बात है जो बाईबिल से नारी के अस्तित्व को दर्शाया है कि श्और परमपिता परमेंश्वर ने आदम को गहरी नींद में सुलाया और इसकी पसलियों में से एक पसली निकालकर उससे उसने नारी को बनाया और आदम के पास लाए।श् उत्पत्ति ( 2ः21-22)
11 नवम्बर 1992 को केन्टबरी गिरजाघर जिसे इंग्लैण्ड के गिरजाघरों की माता कहा जाता है के वेस्ट मिनिस्टरों में एंगलिकन धर्मालंबियों की संसद ने दो तिहाई बहुमत से यह प्रस्ताव पास किया कि महिलाएँं पादरी पद पर प्रतिष्ठत हो सकती है। परिवर्तनवादियों का नेतृत्व करने वाले केन्टबरी चर्च के आर्य बिशप का तर्क था कि परमात्मा न मर्द है न औरत। वह दोनो को अंगीकार करता है। महिलाओं के चर्च में पद में प्राप्ति से पुरूष का आधिपत्य एवं धर्म में व्याप्त असमानता समाप्त होगी। पर रूढ़िवादियों का कहना है कि ईसा मसीह पुरूष थे इसलिए इनके धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले पोप, पादरी, विशप आदि पुरूष होने चाहिए। रोमन कैथोलिक चर्च ने एंगलिकन चर्च के इस प्रस्ताव पर चिंता जाहिर करते हुए उसका विरोध किया। मानव को जन्म देने में स्त्री की भूमिका अधिक है। ईश्वर ने दोनो के एक-दूसरे का पूरक बताते हुए एक-दूसरे के लिए रचा है। नारी अस्मिता एवं स्वतंत्रया की पक्षधर बेट्टी फ्रेडियर ने सन् 1969 में नेशनल काँफ्रेस के अपने आभिभाषण में धर्माचर्यों द्वारा मात्र संतानोत्पत्ति के लिए संभोग की व्यवस्था का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि माँ बनने का निर्णय स्त्रियों के मौलिक प्रतिष्ठा से जुड़ा है। यह निर्णय उसके विवेक,उसकी अंतरात्मा एवं मानवीय मौलिक अधिकार एवं प्रतिष्ठा से जुड़ा है। स्त्रीत्व माँ बनने तक सीमित न रह संपूर्ण मानवीय प्रतिभाओं के विकसित करने के अवसरों से जुड़ा होना चाहिए। जिस तरह पुरूष के पिता बनने के साथ जीवन के बाकी दरवाजे बन्द नहीं होते, उसी तरह स्त्री के भी माँ बनने के साथ बाकी दरवाजे बंद नहीं होने चाहिए। ईसाई मिश्नरीयों एवं उनके शिक्षा पद्धति ने स्त्रीयों व मानवता के प्रति शिक्षा एवं समाज सुधार में पर्याप्त एवं आश्चर्यजनक परिवर्तन लाए जिसके फलस्वरूप आज वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में स्त्रियों के स्थिति मे सामनता एवं सम्मानीय व उच्च स्थान प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान दिए है। आज विश्व के कई स्थानों में महिला ईसाई धर्म प्रचारक अपनी सेवाएं दे रही हैं जिसमे विश्वविख्यात ईसाई महिला प्रचारक जाॅयस मेयर का नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि विवाहित अन्य औरत के लिए ईसाई धर्म में महिला भी धर्म प्रचारक बन सकती हैं जो कि महिला अधिकारों अभियान को पाश्चात्य जगत में पुष्ट करता हैं। विशेष रूप से यह ज्ञात हो कि भारत रत्न ममतामयी सम्मानीय एवं विश्वविख्यात समाजसेविका मदर टेरेसा का नाम उल्लेखनीय है, जो कि एक ईसाई महिला थी।
ईस्लाम धर्म में नारी की स्थिति
औरतों के लिए विवाह का मतलब गुलामी है। बस्ती की एक औरत और कायदे-कानून तो तब एक से ही हैं। उसका खाविंद भी जब चाहे, तलाक-तलाक-तलाक कह सकता है और वह एक-एक कर चार बेगम लाने की शान-शौकत दिखा सकता है। पति का मतलब ही है प्रभु। पत्नी अर्धागिनी होकर भी पति का आधा भाग नहीं है। अर्धागिनी, महर्धािर्मणी शब्दों के पुल्ंिलगवाची शब्द भी कोष में है क्या? नारी और पुरूष के बीच की समानता की कोई धर्म नहीं करता। इस्लाम भी नहीं। इस्लाम की ओर से यह दावा किया जाता है कि यह एकमात्र धर्म है जिसने स्त्री को समान दर्जा दिया। लेकिन कुरान और हदीस जो इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ है को पढ़ने के बाद ही सही बात उजागर होती है कि इस्लाम ने किसी भी स्तर पर स्त्री को समान दर्जा नहीं दिया और एक वक्त ऐसा आया कि स्त्री को हरम में कैंद कर दिया गया। अतः इस पृष्ठभूमि में यह कहा जा सकता है कि तत्कालीन परिस्थितियों में स्त्रियों को मिले तत्काल, सम्पति आदि के अधिकारों के कारण उनकी अवस्था में काफी हद तक बदलाव आया और उस वक्त वे ईसाई-यहुदी समाजों की स्त्रियों से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में थी। पर यह कहना सरासर गलत है कि इस्लाम में स्त्रियों की पुरूष के बराबर दर्जा प्राप्त है। हालाँकि सुर: बकर 2 की एक आयत मंे औरतों का हल मर्दों पर वैसा ही बताया गया है, जैसा कि मर्दाें का औरतों पर लेकिन इसी आयत की अंत में यह लिखा है कि मर्दों की औरतो पर फजीहत ( श्रेष्ठता ) हैै। इस तरह अन्य धर्माें की तरह ईस्लाम ने भी स्त्री को पुरूष के आधीन माना है। सुरः निसा 4 की आयत 34 में कहा गया है कि - मर्द औरतों पर हाकिम और मुसल्लत ( आच्छादित ) है इसलिए खुदा ने कुछ को कुछ से अपबल ( उत्तम ) बनाया है औश्र इसलिए भी कि मर्द अपना माल खर्च करते है तो जो नेक बीवियाँ है, वे मर्दों के हुक्म पर चलती है और उनके पीठ पीछे खुदा की हिफाजत में माल व आवक की खबरदारी करती है। और जिन औरतों के बारे में तुम्हें मालूम हो कि सरकशी अवज्ञा करने लगी है तो पहले उनकों जुबानी समझाओं अगर न समझे तो फिर उनके साथ सोना छोड़ दो। अगर इस पर भी न माने तो मारों-पीटो और फरमावरदार ( आज्ञाकारिणी ) हो जाए तो उन्हंे तकलीफ देने का बहाना मत ढूंढों। बेशक खुदा सबसे ऊँचा और जलीलुल कद्र ( ऊँची इज्जतवाला ) हैै।
ईस्लाम इस धारणा को मानता है कि पहली स्त्री की रचना पुरूष के बांए पैर से हुई है। बाद में दोनो ने मिलकर मानव जाति की रचना की। अतः पुरूष के पैर से स्त्री की रचना हाने के कारण वह पुरूष से हीन मानी गई। विगत 1400 वर्षांे में विभिन्न देशों के मुस्लिम उलेमाओं ने कुरान और हदीस में लिखी बातों की अपने-अपने ढंग से व्याख्या की है, विशेषकर स्त्रियों के मामले में। स्त्रियों को न केवल पुरूष के अधीन रहने की व्यवस्था बल्कि पुरूषों को स्त्रियों पर अत्याचार करने के अपरिमित अधिकार दिए। यहाँ तक कि आरंभ मंे स्त्रियों को जो भी सुरक्षा मिली हुई थी, कालाांतर में वे उनसे भी वंचित कर दी गई। सऊदी अरब, ईरान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि इस्लामिक देशों में नारी को उसके न्यूनतम बुनियादी अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। सबसे बुरी स्थिति तो अफगानिस्तान में है जहाँ नारी को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। उसके दफ्तरों में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया तथा बिना पुरूष को साथ लिए भले ही वह पांच-सात वर्षीया नाबालिक ही क्यों न हो, वह घर से बाहर नहीं जा सकती। कुरान हदीस और शरीयत के नाम पर सदियों से नारी पददलित होती रही है। जब तक नारी को समान दर्जा हासिल नहीं होता यह स्थिति बनी रहेगी। किन्तु धर्म समान दर्जे की इजाजत नहीं देती। जाहिर है नारी को अपना रास्ता खुद चुनना होगा। अपने को अलौकिक, धार्मिक सत्ता से जो पुरूष सत्ता का ही दूसरा रूप है मुक्त किए बिना क्या यह संभव है? भारतीय ईस्लाम धर्म में 18वीं सदी से लेकर अब तक नारियों की स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए है जिसके फलस्वरूप आज हमारे भारतीय परिवेश में सर्वश्रेष्ठ एवं सराहनीय कार्य मुस्लिम महिलाओं द्वारा हुई है। विश्व के पाश्चात्य देशों के बाद भारत ही एक ऐसा राष्ट्र है जहाॅ पर अन्य देशों के तुलना में भारतीय मुस्लिम समाज में बराबरी एवं सम्मान जनक दर्जा मिला हुआ है, जिसे हम भारत की उच्चतम न्यायालय की प्रथम महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति फातिमा बीबी को उदाहरण के रूप में देख सकते है।
सिक्ख धर्म में नारी की स्थिति
सिक्ख धर्म में नारियों को पुरूषों के बराबर सम्मान तथा स्थान हासिल है। 15वीं शताब्दी में गुरू नानक से लेकर 18वीं शताब्दी में गुरू गोविंद सिंह तक सभी दस सिक्ख गुरूओं ने महिलाओं को सामाजिक तथा धार्मिक आजादी दिलाने और उनकी और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा तथ सम्मान की जमकर पैरवी की। गुरू नानक ने तो यह कहकर ’’भंडी जँमीअै भंडी निमीअै भंडी मंगण बिआहू’’ कि स्त्री के बिना पुरूष के जीवन को अधूरा बताया है। नानकजी ने यहाँ तक कहा- सो क्यों मंदा आखिए जित जनै राजन: अर्थात् महान प्रतापी राजाओं को जन्म देने वाली स्त्री जाति को नीच कहना महापाप है। उस जमाने में वेद शास्त्र आदि पढ़ने तथा हवन आदि में शामिल होने की औरतों को मनाही थी। पर नानक जी ने यह फरमाकर कि सुन मण्डल इक जोगी बैसे, नारी न पुरखु कहहू कोई, जैसे अमर संदेश दिया कि ईश्वर की ज्योति, जो प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है उसे नारी कहा जा सकता है न पुरूष। वह परमात्मा का ही अंश है। गुरूनानक ने तो यहाँ तक घोषणा कर दी कि ईश्वर की दरगाह में केवल वही व्यक्ति सम्मान-सत्कार करते है।
जित मुख सदा सालाहीअै भागा रती चार।
नानक ते मुख उजलै तितु सचै दरबार।।
महिलाओं के हक सम्मान और आजादी की जो क्रांतिकारी मशाल गुरूनानक ने जलाई उसके बाद के गुरूआंे ने अपने आंचल की ओट दी और कभी बुझने न दिया। उस वक्त की अनेक सामाजिक बुराइयों में प्रमुख थी सतीप्रथा और विधवा जीवन के साथ जुड़ा सामाजिक लांछन। तीसरे गुरू श्री अमरदास ने उन दोनो के खिलाफ आवाज बुलंद की। उन्होंने फरमाया कि पतिव्रता स्त्री होने का अर्थ यह नहीं कि पत्नी पति के साथ जल मरे। सच्ची पतिव्रता कही है जो विरह को सहे। गुरू अमरदासजी ने अनेक विधवाओं को अपने हाथों से विवाह करवाकर उन्हें उपेक्षा तथा अपमान की जिंदगी से बाहर निकाला ओर उनका सामाजिक पुनर्वास किया। यही नहीं पंजाब मे तथा पंजाब से बाहर धर्म के प्रचार के लिए गुरू अमरदास ने जो धार्मिक पीठें स्थापित की उनमें कई पीठों पर महिलाओं को नियुक्त करके उन्हें मिशनरी की एक सर्वथा नीवन तथा उच्च सामाजिक-अध्यात्मिक सम्मानवाली भूमिका प्रदान की। इसी तरह सिक्ख इतिहास में जिक्र आता है कि छठे गुरू हरगोविंदजी से एक बार गुजरात के जाने-माने सूफी दरवेश शाह दोलाँ ने पूछा कि औरत क्या है? इस पर गुरूजी ने जवाब दिया औरत ईमान है।
मध्य युग मंे भारतीय समाज में बच्चियों का जनमते ही गला घोट देने की अमानवीय प्रथा विद्यमान थी। सिक्ख गुरूओं ने उस प्रथा की कड़ी निंदा की और अपने अनुयायियों को कुड़ीमार ( लडकी का हत्यारा ) का सामाजिक बहिष्कार करने तथा उनके साथ रोटी-बेटी का रिश्ता न रखने की हिदायत दी। इस संबंध में गुरूगोंविंद सिंहका हुक्मनाम स्पष्ट है-
शमोणा और मसंदीआ, मोना कुड़ी जुमार।
होई सिक्ख वरतण करै, अंत करेगु खुआर।।
इस सिद्धांत पर अमल करते हुए 18वीं शताब्दी के योद्धा जस्सा सिंह रामगढ़िया को कुड़ीमार होने के दोष से पंथ में निकाल दिया गया था। इस अपराध के लिए जब उसने समूचे खालसा पंथ से माफी मांगी तब उसे दोबारा वापस लिया गया। सन् 1699 को बैसाखी के मौके पर पुरूषों के साथ-साथ सिक्ख स्त्रियों को अमृत की दीक्षा देकर गुरू गोविंद सिंह ने उन्हें एक नई जुझारू शक्ति दी। उस शक्ति से पैदा हुई भाई भागो जैसी योद्धा सिक्ख स्त्री ने चमकौर के युद्ध में गुरू गोविंदसिंह की सेना की ओर से लड़ते हुए दुश्मन के दांत खट्टे कर दिए। इस युद्ध में बीवी हरशरण कौर युद्ध के मैदान में पहुँचकर शहीद सिक्खों की लाशों का अंतिम संस्कार करते हुए अंततः शहीद हो गइ। इस प्रकार इतिहास के निर्माण में महिलाओं की शानदार भूमिका का एक और अध्याय जुड़ गया।
सिक्ख धर्म में अनेक ऐसी शूरवीर महिलाऐं हुई जिन्होंने सिक्ख धर्म के विरोध में उठने वाली अन्याय के खिलाफ आये दिन अनेक प्रकार की सहयोग प्रदान की तथा महान योद्धा भी हुई जिन्होंने देशभक्त और गुरू भक्त की अनुपम आदर्श प्रस्तुत की। जिसका प्रमाण सिक्ख धर्म के महान हस्तियों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। जिन्होंने न अपने बहादुरी बुद्धिमानी और चतुराई से समय-समय पर सिक्ख धर्म को प्रतिष्ठा के ऊँचाईयों पर पहुचाने मे महान योगदान दी। जिनमें से कुछ का नाम इस प्रकार है - बीबी नानकजी राणी, बी. वी राजे, भागोजी, राणी कनोजी, माता संुदरी, बीवी दीपकौर, बीबी धरमकौर, बीवी साहब कौर तथा महाराणी जिंदाजी, पंजाब केशरी महाराजा रणजीत सिंह की पत्नी महराणी जिदाजी होत्या इत्यादि। अतः सिक्ख धर्म में नारी की स्थिति सम्मानजनक थी और वर्तमान में भी समाज में बेहतर व समान अस्तित्व देखी जा सकती है। साथ ही साथ विडम्बना यहा भी है कि आज ईसवीं सदी मे कम्प्यूटर और उच्च प्रौद्यौगिकी युग में सिक्खों की धरती में भ्रुण हत्या जैसे जघन्य अपराध लगातार बढ़ते ही जा रहे है। परिणाम स्वरूप चण्ड़ीगढ़, पंजाब, हरियाणा व दिल्ली जैसे स्थानों में लिंगानुपात क्रमशः 773/1000, 874/1000, 861/1000 तथा 821/1000 हो गयी है जो कि भारत के अन्य राज्यों की तुलना में निम्नतम लिंगानुपात हैं। यहाॅ विशेष उल्लेखनीय बात तो यह है कि ये स्थान उन्ही स्थानो में मशहूर है जहाॅ सिख धर्मालंबियों की जनसंख्या घनत्व काफी सघन है। इसे चित्र क्र. 1 एवं 2 से देखा जा सकता है।
उपसंहार:-
मानव जाति का अस्तित्व नारी के बिना होना असंभव ही नहंी बल्कि कल्पना के परे से दूर है। मानव जाति के जीवन का अस्तित्व पूर्ण रूप से नारी और पुरूष की समान योगदान से अब तक परिपूर्ण है अन्यथा एक के बिना भी जीवन का अस्तित्व नामुनकिन है। धर्मों में चाहे कितनी भी नारियों की उपेक्षित स्थिति बताई गई हो परन्तु सच्चाई तो यही है कि मानव जीवन की विकास के लिए नारी ही उत्तरदायी है अर्थात मानव जीवन के संपूर्णता एवं अस्तित्व को बनाए रखने हेतु नारी की सर्वोच्च स्थान है। नारी चाहे स्वतंत्र हो या पराधीन परन्तु मानव के अस्तित्व को बनाए रखने हेतु जितना पुरूष का उत्तरदायित्व है उससे बढ़कर नारी का उच्च और सराहनीय योगदान है। अतः पुरूष और नारी एक-दूसरे के पूरक है एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती यही एक मात्र सच्चाई है जो मानव जीवन के अस्तित्व को बनाये रखने में महत्वपूर्ण और अटूट कड़ी है।
एक ओर स्त्री की अस्मिता से सरोकार रखने वाले स्वतंत्रता, शिक्षा, समानता एवं अधिकारों के बुनियादी सवाल है तो दूसरी ओर स्त्री को मात्र भोग्या , बच्चे जनने वाली उपकरण मात्र माने जाने वाले धार्मिक सामजिक संस्कार, विधान, प्रथाएं और अंधविश्वास। विडम्बना यह कि पुरूष के वर्चस्व को स्थापित कर स्त्री की मर्यादा को अपदस्थ करने वाले संस्कार रीति-रिवाज और प्रथाओं को अगली पीढ़ि तक संवाहित करने वाली अधिकांशतः स्त्रियां ही होती है जो अपने अज्ञान व अशिक्षा के फलस्वरूप उन संस्कारों को अपना धर्म समझकर स्वयं तो पालन करती है, अपनी बेटियांे में बचपन में उन्हीं संस्कारों को परोसती है। जिसे समाज विज्ञान की भाषा में समाजीकरण कहा जाता है लिहाजा स्त्री स्वतंत्रय, शिक्षा, समानता का विरोध पुरूष से भी अधिक स्त्रिओं के द्वारा होता है उनकी दृष्टि में पढ़ाने-लिखाने और आजादी देने से लड़कियां बिगड़ जाती है जबकि असलियत यह होती है कि वस्तुस्थिति से भलीभांती अवगत होने पर अपने प्रति होने वाले भेदभावपूर्ण व्यवहार अन्याय एवं अत्याचार का विरोध करने की की दृष्टि और साहस के विकास की संभावना का खतरा उनमें उत्पन्न हो जाता है। लेकिन आज के धर्मभीरू समाज को यह खतरा इसलिए नहीं है कि स्त्रियों में जड़ धार्मिक संस्कार इतने गहरे बैठे हुए है कि उन्हें उखाड़ना फिलहाल असंभव सा लगता है।
आज भी स्त्रियां अपार कष्ट अत्याचार और दुख सहन करती है। भेदभाव एवं अत्याचारपूर्ण रीति-रिवाजों एवं प्रथाओं के प्रति उनके हृदय मेें दुख एवं गुस्सा भी है पर वे इतने असहाय, आत्मविश्वासहीन एवं निरूपाय है कि यथास्थिति को चुपचााप स्वीकार ही नहंी करती बल्कि आने वाली पीढ़ि को भी स्वीकार करने के संस्कार देती है। स्त्री जाति को इस स्थिति में धर्म ने पहुुचाया है। लिहाजा जब तक धर्म या धर्म का वर्तमान स्वरूप होगा नारी स्वतंत्रय नारी की समानता एवं पहचान की आशा करना निरर्थक है। अंतिम में यह बात स्वीकार योग्य एवं वास्तविक है कि स्त्री-पुरूष के समान संबंधों में धर्म सबसे बड़ी बाधा है। आज ऐसे सोच को विकसित करने की आवश्यकता है जो स्त्री-पुरूष से नहीं उसके दासत्व एवं आधिपत्य से मुक्ति दिलाकर उसकी अस्मिता को प्रतिष्ठित करे तथा समानता मध्योग ओर संवेदना पर आधारित परस्पर पूरक संबंधों को विकसित करने में सहायक हो, अन्यथा स्वतंत्रता एवं शिक्षा के बावजूद स्वस्थ, सन्तुलित समाज का विकास संभव नहीं। भारत में घटते लिंगानुपात का स्तर इस बात का घोतक है कि चाहे हम तकनीकी एवं भौतिक रूप से कितनी भी उन्नति कर लें तथा अपने आप को वैज्ञानिक भौतिकवाद से जोड़कर व उन साधनों का उपयेाग कर अपने आधुनिक होने का कितना भी ढिंढोरा पीट ले भारत की जनगणना 2001 से प्राप्त आंकड़े ंतो यही चिल्ला चिल्लाकर कह रही है कि हमारे अंतस में जड़ किये हुए धार्मिक रूढ़ियों से आजाद होने में अभी और वक्त लगेंगा। चित्र क्र. 3 से यह स्पष्ट हो रहा है कि जहाॅ वर्ष 1901 में हमारे देश में लिंगानुपात 972 महिलाएं/1000 पुरूष थी जो वर्ष 2001 में अर्थात एक शताब्दि बाद 933 महिलाएॅ/1000 पुरूष हो गयी हैं दिल्ली, चण्ड़ीगढ़, पंजाब व हरियाणा के लिंगानुपात सबंधी आंकड़ों के प्रकाश में यह निष्कर्ष निकलता है कि हम भारतीय आर्थिक व शैक्षिक रूप से जितनी प्रगति करते जा रहेे है उसी गति से हम महिला अधिकारों को जड़ से ही नष्ट करते जा रहें है ताकि न रहेेगी बांस और न बजेगी बांसुरी कैसे।?
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Received on 04.10.2013 Modified on 11.11.2013
Accepted on 25.11.2013 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 1(2): Oct. - Dec. 2013; Page 39-44